Saturday, 10 April 2010


डायबिटीज, ह्रदय रोग, पक्षाघात, एडस
नहीं यही बीमारियां नहीं होतीं
वो क्या है जो हमें मजबूर करता है
जिन्दगी भर
उन खुराफातों के लिए
जो कभी तो हम चाहते हैं
कभी नहीं चाहते हुए भी
सम्पन्न करते हैं
जैसे नौकरी, जैसे ब्‍लागि‍न्‍ग

गहरी नींद है
गहरा आलस है
और ‘मैं’ जकड़ा ही हुआ है
मौत के जबड़ों में

फिर भी चार पहर की नौकरी
चार पहर की खुमारी
दैहिक उत्तेजनाओं के बहकावे
कुछ बन जाने - कुछ हो जाने के छलावे
बीवी-बच्चे दुनियादारी

नहीं ये बीमारी तो नहीं है
फिर भी
जाने क्यों लगता है
रोज-ब-रोज
मैं स्खलित हो रहा हूं
खो रहा हूं अनायास ही
अपने आप ही
अपने होने जैसा सब कुछ

पुराना होता जिस्म
कम होता त्वचा का कसाव
चार सीढ़ियां चढ़ने पर भी
चढ़ जाने वाली सांसें
हरदम झुंझलाहट
कि अभी तक तो कुछ हो जाना चाहिये था

नहीं ये बीमारी नहीं है
ये मेरे मैं का मरना है
जो रोज जिन्दा होने के लिए
दफ्तर जाता है
काम करता है
गंभीरतापूर्वक
लोगों से फालतू बातचीत करता है
जबकि मालूम है
उसे और सबको
चौराहों पर होने वाली
मंडलियों में गाने बजाने वाली
सन्यासियों के समूहों में ध्यान करने वाली
और अब
इंटरनेट, ब्‍लागि‍न्‍ग ओरकुटिंग, बजिंग से होने वाली
इन गंभीर बातों से
5000 सालों से कुछ नहीं बदला

अब तो, तीन चार दशक निकल ही चुके हैं
और वो तो कभी भी आ सकती है
उसने पूछ के या
बता के थोड़ी आना है

क्या पता
वो आखिरी बहाना क्या हो
या कोई बहाना ही ना हो
क्योंकि सीधे ही आ जाना
उसकी कुदरत है

हमेशा
मैंने एक ही समाधान पाया है
कि उसका इंतजार किया जाये
हर पल
क्या पता किस पल के बाद
बस वही पल हो।
शायद उसकी बस एक झलक
मेरी लम्बी बकवास जिन्दगी को
अर्थ दे जाये।

मेरे अपने, और सबके लिये।
जो दो अलग अलग बातें नहीं है।