Wednesday, 3 March 2010

तुमसे बातचीत


मैंने तो खूब चाहा था
कि आज रात...
चांद से बोल-चाल बंद रखूं।

पर, तुमने आज भी चेहरा छिपा रखा था
बेजुबान शब्दों की खामोशी में।

मेरे जलते हुए सीने में
सूरज रोज डूबता है।

और हर रात मैं -
सुबह तक चांद से बातें करता हूं।
कि, कभी तो तुम्हारा चेहरा समझ आयेगा
और उसके कहे हुए,
अबोले शब्द भी।