Saturday, 13 February 2010

वो झुकी निगाह


उस झुकी निगाह को, इंकार कैसे करते हम
याद रही है जन्म भर, फिर वो झुकी निगाह

जब्त कर के चाह को, आह भर कर रह गये
मर गये उस लम्हे में, न कभी उठी निगाह

जमाना भर हमदर्द था, दर्द ना वो कभी मिटा
जिसने हमको देखा बोला, कैसी लुटी निगाह?

सिसकियां जीते रहे, हिचकियों में रातें कटीं
आईने से बातें थीं, थी दम घुटी निगाह

जाने कब तुझे खो दिया, दिल अश्कों में डुबो दिया
लख लानतें मेरी नजर पर, कैसे चुकी निगाह