Tuesday, 9 February 2010

आदमी कैसे कैसे जीना सीख गया है


पाना-खोना झूठा, छोड़ के जानी दुनियां
फिर भी कितने ख्वाब संजोना सीख गया है
आदमी कैसे कैसे जीना सीख गया है

धो धोकर पीता है चरणरज मक्कारों की
जहर भी, और बहुत कुछ पीना सीख गया है
आदमी कैसे कैसे जीना सीख गया है

चौराहों पर मौतों से कोई फर्क नहीं है
आदमी, कितने आतंकों में जीना सीख गया है
आदमी कैसे कैसे जीना सीख गया है

गया जमाना - अब मोर नहीं जंगल में नाचते
बोली लगाना हर एक नगीना सीख गया है
आदमी कैसे कैसे जीना सीख गया है

बीती यादों में जिन्दगी नर्क हुई जाती है
तेरे नाम का जप-सा दिल ये कमीना सीख गया है
आदमी कैसे कैसे जीना सीख गया है