Tuesday, 29 December 2009

गुनगुनाने की कोशिश




सुबह ने सारे सपने खोये, रात ने साये उजालों के
आंसू का खारापन चुभता, यादों के उभरे छालों पे

आंखों पर धुंधलापन उतरा, धूल जमीं है जालों पे
लोग क्यों बेजा अटके से हैं, धूप चांदनी की मिसालों पे


पत्तों से छनकर उतरी जो, आंच नहीं वो सीलन है
यह जम कर जहरीली होगी, वक्त की कई सम्हालों पे

गुनगुनाने की कोशिश में, सांसों से कई कराहें उठीं
अक्सर कई निगाहें उठीं, शुष्क लबों के तालों पे


कई कुपोषण फैले थे, मेरे सीने में तपेदिक से
ऐतराज था उनको, गिनकर, मेरे खुश्क निवालों पे

मौत की खूंटी पर टंगी, चिथड़े-सी जिन्दगी लटकी थी
लहराती थी अंगड़ाई लेकर, मेरे जवाबों-सवालों पे