Saturday, 7 November 2009

नई तरकीबें




मेरी दीवानगी की हदें, अज़ब सी चीजें ढूंढती हैं
ख़्वाबों के तहखाने में, जिन्दा उम्मीदे ढूंढती हैं

मसीहा भी तैयारी से, आते हैं इन्सानों में
मालूम उन्हें भी होता है, क्या सलीबें ढूंढती हैं


हजारों दिवालियां चली गई, पर राम नहीं लौटे
नन्हें चिरागों की रोशनियाँ, अब नई तरकीबें ढूंढती हैं


बिना ब्याहे संग रहना, और माई-बाप से तंग रहना
जाने क्या? कैसे रिश्ते? अब तहजीबें ढूंढती हैं


इस ब्‍लॉग पर रचनाएं मौलिक एवं अन्‍यत्र राजेशा द्वारा ही प्रकाशनीय हैं। प्रेरित होने हेतु स्‍वागत है।
नकल, तोड़ मरोड़ कर प्रस्‍तुत करने की इच्‍छा होने पर आत्‍मा की आवाज सुनें।