Friday, 28 August 2009

सच की कड़वाहट

दो फिल्मी यार बरसों से फिल्म लाईन में स्थापित थे। सच और झूठ विषय को लेकर उन्होंने कई हिट फिल्में दीं थीं। रात की दारू पार्टी में दोनों अपने नयी फिल्मों की विषय सामग्री पर बातचीत कर रहे थे।

राम: क्या दारू पीकर सभी लोग सच बोलते हैं?

जाॅन: मेरे खयाल से वो वैसा सच बोलते हैं जो उनकी नस नस में बसा होता है, जिससे वो मजबूर होते हैं...

राम: मतलब?

जाॅन: सामान्यतौर पर झूठ बोलने वाला नशे में भी झूठ बोलता है और सच बोलने वाला सच ही बोलेगा। आजकल बोलने वाले सच अलग होते हैं और करने वाले सच अलग तो दोनों को कोई फर्क नहीं पड़ता।

राम: फिर वही सवाल सामने आता है - जनता क्या चाहती है?

जाॅन: जनता थियेटर में सच झूठ देखने नहीं, बोरियत दूर करने टाईम पास को आती है।

राम: पर कुछ तो सच होता है न, अपना फेमस डाॅयलाॅग ‘सत्यमेव जयते’।

जाॅन: घंटा जयते। हजारों साल लोग झूठ का मजा लेते लेते बोर हो जाते हैं तो फिर टेस्ट चेंज करने को सच की मिर्च से स्वाद बदलते हैं। लेकिन इसकी जरूरत हजारों सालों में एक बार पड़ती है.... कभी कभी बस एक बार। जीसस, गांधी, हरिश्चन्द्र, राम ........ सब मिर्ची का काम करते हैं।

हजारों साल तक वही ढर्रा, वाॅर, एड्रेन्लिन जगाने वाला मसाला, ये सब झूठ है तो क्या? यही चलता है।

राम: चलो मैं एक फिल्म बनाता हूं सात्विक, धार्मिक हरिश्चन्द्र टाईप। एक फिल्म तुम एक्शन, मसाला एड्रेन्लिन जगाने वाली।

जाॅन: ओ.के.

डेढ़ दो साल बाद दोनों की फिल्में तैयार होकर आधुनिक थियेटरों पर चलीं।
जाॅन की फिल्म का नाम था ‘आग का दरिया’ और राम की फिल्म का नाम था ‘‘आब’’
‘आग का दरिया‘ की कहानी अपनी गदर फिल्म जैसी थी। मुसलमानों को भरपूर गालियाँ, हिन्दुओं की उदारता की गाथा,  राम कृष्ण की धरती की महानता, किसी हिन्दू का उफान मारता जोश। फिल्म खूब चली। इसके जवाब में पाकिस्तानियों ने भी कई फिल्में बनाईं। जिनमें मोटी मोटी हीरोइने जाने किस शैली में डांस करती थीं। मोटापे के लिहाज से उन्हें भारतीय दक्षिण की फिल्मी हीरोइनों के डांस का अनुसरण करना चाहिए।

‘‘आब’’ में हिन्दू मुस्लिम एकता को मिसालें देते एक कबीरनुमा फकीर की कहानी थी। भारत पाक बार्डर के दोनों तरफ लोग उसके मुरीद हो जाते हैं और अमन और तरक्की के रास्ते पर चलते हैं तो यह हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के हुक्मरानों को और एड्रेन्लिन जागरण पसंद लोगों को अच्छा नहीं लगता। आखिर में कई प्रश्न हवा मंे छोड़ती हुई फिल्म द एंड को प्राप्त होती है। प्रश्न ये थे कि जो हिन्दुस्तान पाक के बीच पिस रहें हैं उनका क्या? जो खर्च हिन्दुस्तानी पाकिस्तानी सेनाओं पर सीमा की स्थिति संभालने के लिए खर्च हो रहा है, क्या वह तरक्की के लिए नहीं हो सकता? यह फिल्म कलासमीक्षकों को पसंद आई। थियेटरों में नहीं चली पर पुरस्कार मिले। सैकड़ा भर पाकिस्तानी कलाफिल्म पसंदों ने इसे पसंद किया।

राम और जाॅन, फिर दारू पार्टी पर मिले।
जाॅन: मैं बोला था न जनता को सच झूठ से मतलब नहीं। एड्रेन्लिन जागना चाहिए।
राम: हाँ, सच की उतनी ही जरूरत है जितनी आटे में नमक। ज्यादा सच जिंदगी को कड़वा कर देता है।